गौर कैस्केड्स जीबीएम की वैधता पर उठे सवाल; प्रशासनिक चुप्पी से निवासियों का भरोसा डगमगाया

गाजियाबाद। राजनगर एक्सटेंशन स्थित गौर कैस्केड्स सोसाइटी में अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन (एओए) को लेकर पिछले कई महीनों से चला आ रहा विवाद अब नए मोड़ पर पहुंच गया है। रविवार, 15 मार्च को सोसाइटी में जनरल बॉडी मीटिंग (जीबीएम) आयोजित की गई, जिसमें एओए चुनाव कराने और बिल्डर के पास जमा आईएफएमएस फंड वापस लेने के लिए कानूनी कार्रवाई जैसे महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर सहमति बनने का दावा किया गया। लेकिन इस बैठक की वैधता, इसे बुलाने के अधिकार और पूरे प्रकरण में प्रशासन की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
सोसाइटी के कुछ निर्वाचित बोर्ड सदस्यों और निवासियों का आरोप है कि यह विवाद केवल आंतरिक खींचतान तक सीमित नहीं है, बल्कि समय पर निर्णायक प्रशासनिक हस्तक्षेप न होने के कारण अब संस्थागत अव्यवस्था का रूप ले चुका है। उनका कहना है कि शिकायतों, दस्तावेजों और आपत्तियों के बावजूद संबंधित विभाग, विशेषकर डिप्टी रजिस्ट्रार कार्यालय, ने अब तक ऐसा कोई स्पष्ट और ठोस निर्णय नहीं दिया जिससे स्थिति साफ हो पाती। इसी अनिश्चितता ने सोसाइटी में भ्रम, अविश्वास और ध्रुवीकरण को बढ़ावा दिया है।
विवाद का केंद्र पुनीत गोयल की सदस्यता और अधिकार क्षेत्र को लेकर है। चार बोर्ड सदस्य, अनुज कुमार राठी, संजीव कुमार मलिक, निधि शर्मा और इति सिंघल का कहना है कि रिकॉर्ड के अनुसार पुनीत गोयल ने 21 नवंबर 2026 को अपना फ्लैट बेच दिया था। उनके अनुसार संपत्ति विक्रय के बाद एओए की सदस्यता तथा बोर्ड में पद स्वतः समाप्त हो जाना चाहिए था। इसी आधार पर इन चारों सदस्यों ने 15 मार्च की जीबीएम को नियमविरुद्ध और अवैध बताया तथा बैठक का बहिष्कार किया।
इन बोर्ड सदस्यों द्वारा डिप्टी रजिस्ट्रार को भेजे गए शिकायती पत्र में कहा गया है कि एक “अनधिकृत व्यक्ति” द्वारा बुलाई गई जनरल बॉडी मीटिंग वैधानिक नहीं मानी जा सकती और उसमें लिए गए निर्णय भी अमान्य होंगे। पत्र में यह भी उल्लेख है कि यदि एओए सदस्यता संपत्ति स्वामित्व से जुड़ी है, तो फ्लैट बेचने के बाद संबंधित व्यक्ति का बोर्ड अथवा एसोसिएशन में बने रहना नियमों के अनुरूप नहीं माना जा सकता। शिकायतकर्ताओं ने प्रशासन से स्पष्ट दिशा-निर्देश की मांग की है।
पूर्व एओए अध्यक्ष अनुज कुमार राठी ने पूरे मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि सोसाइटी में आज जो स्थिति बनी है, उसके लिए डिप्टी रजिस्ट्रार कार्यालय की निष्क्रियता जिम्मेदार है। उनका आरोप है कि शिकायतें लंबे समय से दी जा रही थीं, लेकिन हर बार मामले को लंबित रखा गया और समय रहते नियमों का अनुपालन सुनिश्चित नहीं कराया गया। राठी का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति की सदस्यता पर विवाद है, तो पहले उसी पर स्पष्ट आदेश होना चाहिए था। उनके अनुसार प्रशासन की चुप्पी ने ऐसी स्थिति पैदा की जिसमें नियमों की अलग-अलग व्याख्याएं की जाने लगीं और सोसाइटी का वैधानिक ढांचा कमजोर पड़ता गया।
दूसरी ओर, पुनीत गोयल ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि 15 मार्च की बैठक शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुई और उसमें बहुमत के साथ सोसाइटी हित में कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। उनका कहना है कि सोसाइटी में लंबे समय से चल रहे विवाद को समाप्त करने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बहाल करने के लिए अप्रैल 2026 में नए चुनाव कराने का निर्णय लिया गया है। साथ ही बिल्डर के पास जमा सोसाइटी के करोड़ों रुपये के आईएफएमएस फंड को वापस लेने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने का भी फैसला हुआ है। गोयल ने यह भी कहा कि वह “कभी सोसाइटी छोड़कर नहीं गए” और आज भी स्वयं को सदस्य मानते हैं।
यही परस्पर विरोधी दावे अब पूरे विवाद को और संवेदनशील बना रहे हैं। एक पक्ष बैठक को नियमसम्मत और बहुमत आधारित बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष उसे मूल रूप से अवैध करार दे रहा है। चूंकि अब तक संबंधित प्रशासनिक प्राधिकारी की ओर से सार्वजनिक रूप से कोई अंतिम, स्पष्ट और निर्णायक स्थिति सामने नहीं आई है, इसलिए निवासियों के बीच असमंजस और बढ़ गया है।
सोसाइटी के भीतर रहने वाले कई लोगों का कहना है कि इस तरह की खींचतान से सबसे अधिक नुकसान आम निवासियों को हो रहा है। रखरखाव, जवाबदेही, वित्तीय पारदर्शिता और प्रतिनिधित्व जैसे बुनियादी मुद्दे अब विवाद की भेंट चढ़ते दिखाई दे रहे हैं। निवासियों के बीच यह भावना भी उभर रही है कि जब वैधानिक संस्थाओं और प्रशासन से समय पर स्पष्टता नहीं मिलती, तो सामुदायिक विश्वास कमजोर पड़ता है। एओए जैसी संस्था, जिसका उद्देश्य सामूहिक हितों की रक्षा और सोसाइटी प्रबंधन को सुचारु रखना है, वही अविश्वास, आरोप-प्रत्यारोप और कानूनी उलझनों के घेरे में दिखाई दे रही है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि बहुमंजिला आवासीय परिसरों में एओए विवादों को लंबा खींचने से केवल प्रबंधन संकट ही नहीं पैदा होता, बल्कि सामुदायिक ताने-बाने पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है। जब एक ही सोसाइटी में दो समानांतर दावे, दो अलग-अलग वैधताएं और परस्पर विरोधी निर्णय सामने आने लगें, तो निवासियों का भरोसा संस्थागत ढांचे से उठने लगता है। गौर कैस्केड्स का मौजूदा विवाद भी इसी व्यापक संकट की ओर संकेत करता है।
फिलहाल निगाहें अब संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं। यदि सदस्यता, अधिकार क्षेत्र और जीबीएम की वैधता पर जल्द स्पष्ट निर्णय नहीं आता, तो मामला और उलझ सकता है। वहीं बहिष्कार करने वाले बोर्ड सदस्यों ने संकेत दिया है कि वे इस प्रकरण को शासन स्तर तक ले जाएंगे। ऐसे में यह विवाद अब केवल एक सोसाइटी के आंतरिक प्रबंधन का मामला नहीं रह गया, बल्कि यह प्रश्न भी बन गया है कि क्या संबंधित प्रशासन समय रहते हस्तक्षेप कर नागरिक संस्थाओं में भरोसा बहाल कर पाएगा।


