
बुलंदशहर जिले का सैदपुर गांव है लोगों के लिए मिसाल, जहां हर घर से निकलते हैं सैनिक,सैदपुर गांव के 117 बेटे देश के लिए कर चुके हैं प्राण न्यौछावर, गांव में युवकों को दी जाती आर्मी में भर्ती होने के लिए विशेष ट्रेनिंग
उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले में एक गांव है जहां के लोगों की रगों में देशभक्ति बहती है। जहां की मिट्टी में वीर पैदा होते हैं, यहां के हर घर से सैनिक निकलते हैं। बुलंदशहर के किसी कोने में आप इस गांव के बारे में पूछना शुरू करेंगे तो लोग रास्ता बता देंगे, अच्छा वो गांव जहां के हर घर में सैनिक हैं। कुछ ऐसे ही पहचान है सैदपुर की। और हो भी क्यों न करीब 25-30 हजार वाली सैदपुर ग्राम पंचायत का नाता आजाद हिंद फौज से लेकर देश की तीनों सेनाओं और कई सुरक्षा बलों से हैं। सैदपुर ने देश को हजारों जवानों से लेकर मेजर जनरल तक दिए हैं। इस गांव के 117 जवान अब तक शहीद हो चुके हैं जबकि गांव के बच्चे-बच्चे के अंदर देश सेवा का जज्बा देखने को मिलता है



देश भक्ति का जुनून इस गांव से सीखा जा सकता है। पुलवामा हमले के बाद इस गांव के कई पूर्व सैनिकों ने अपनी पूरी पेंशन प्रधानमंत्री राहत कोष में दान कर दी थी
इस गांव के लिए देशभक्ति के क्या मायने हैं यहां के दरोदिवार भी उसकी गवाही देते हैं। कई घरों में तिरंगा बना है। कई घरों में पेंटिंग भी तिरंगे के रंग वाली है। सैदपुर के स्थानीय निवासी कुशलपाल सिंह कहते हैं, ये शहीदों वाला सैदपुर है। हमारी मिट्टी में ही कुछ ऐसा है कि हर घर से जवान निकलते हैं। हमारे यहां विभिन्न सेनाओं से रिटायर जवानों (पेंसनर्स) की संख्या करीब 4000 है, जबकि 1500 लोग अभी सेना, एयरफोर्स, नेवी और दूसरे सुरक्षाबलों में तैनात है। गांव ने मेजर जनरल भी दिए हैं।’ मेजर जनरल श्योराज सिंह अहलावत इसी गांव के हैं।

विश्वयुद्ध में लिया था भाग, 29 सैनिक हुए थे शहीद
सैदपुर गांव में शौर्य, साहस और मातृभूमि के लिए जान तक न्यौछावर करने की परंपरा पुरानी है। यही वजह है कि यहां हर परिवार फौजी का परिवार है। बात अंग्रेसी हुकूमत काल करें तो विश्वयुद्ध के दौरान 1914 में यहां के 155 सैनिक जर्मनी गए थे। इनमें से 29 जवान शहीद हो गए और करीब 100 जवान वहीं बस गए। जिस जगह ये लोग रहने लगे उस जगह का नाम जाटलैंट रख दिया। सेना इस गांव के लिए स्पेशल भर्ती का भी आयोजन करती है।
गांव के सरकारी इंटरकॉलेज के पास खेल का कच्चा मैदान है। जहां सुबह से लेकर देर शाम तक गांव के बच्चे और जवान दौड़ लगाते हैं। गांव के युवा मोनू (18 वर्ष) बताते हैं कि वो दो बार भर्ती दौड़ में शामिल हो चुके हैं, लेकिन चयन नहीं हुआ है। ” मेरा सपना है शरीर पर सेना की वर्दी पहनना। जब तक शरीर में ताकत है और सर्टीफिकेट में उम्र है भर्तियों में शामिल होता रहूंगा। उम्मीद है अगले एक दो साल में चुन लिया जाउंगा।’


इंदिरा गांधी खुद शहीद का अस्थिकलश लेकर पहुंची थी सैदपुर
हर युद्ध में निशान 1962 का युद्ध हो या 1965 का, या फिर 71 और कारगिल का युद्ध हो, हर युद्ध में सैदपुर की वीरता के किस्से बिखरे हुए हैं। 65 के युद्ध में कैप्टन सुखबीर सिरोही वीरगति को प्रप्त हुए तो खुद इंदिया गांधी उनका अस्थि कलश लेकर गांव पहुंची थीं। 71 के युद्ध में एक ही दिन गांव के दो सिरोहियों ने शहादत दी। 1965 की लड़ाई में सैदपुर के सुखबीर सिंह सिरोही को परमवीर चक्र मिला था। इसके अलावा सैदपुर की आंचल में शौर्य एवं साहस के लिए देश-प्रदेश से मिले दर्जनों मेडल है।





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