घनाकोहरे और कड़ाके की ठंड में बेघर ज़िंदगी: स्मार्ट सिटी मेरठ में बेगमपुल डिवाइडर पर रात गुज़ारते मासूम

मेरठ। एक ओर मेरठ स्मार्ट सिटी बनने का सपना देख रहा है, दूसरी ओर शहर की सड़कों पर ठंड से जूझती ज़िंदगियां उस दावे की हकीकत बयां कर रही हैं। बुधवार को मेरठ और आसपास के इलाकों में घनाकोहरा और भीषण ठंड देखने को मिली। तापमान में तेज गिरावट के बीच बेगमपुल क्षेत्र में सामने बन रहे मेट्रो स्टेशन के पास डिवाइडर पर खुले आसमान के नीचे मासूम बच्चे और महिलाएं रात गुज़ारते नजर आए।
घने कोहरे के बीच सड़कों पर वाहनों की रफ्तार थमी हुई थी, लेकिन डिवाइडर पर बिछे पुराने कंबलों और चिथड़ों में लिपटे ये बच्चे ठंड से कांपते रहे। नन्हे हाथों में न गर्म कपड़े थे, न सिर छुपाने को छत। मां बच्चों को सीने से लगाकर ठंड से बचाने की कोशिश कर रही थी, लेकिन गलन भरी हवा हर कोशिश को बेबस बना रही थी।
स्थानीय लोगों का कहना है कि बेगमपुल जैसे व्यस्त इलाके में यह नज़ारा रोज़ देखने को मिलता है। सवाल यह है कि क्या स्मार्ट सिटी के भीतर गरीबों और बेघर लोगों के लिए पर्याप्त रैन बसेरे मौजूद हैं? सर्द रातों में इन मासूमों की सुरक्षा और जीवन की जिम्मेदारी किसकी है?

मानवता के लिहाज़ से यह दृश्य झकझोरने वाला है। बच्चे, जो स्कूल और खेल के मैदानों में होने चाहिए, वे सड़कों पर ज़िंदगी और ठंड से जंग लड़ते दिख रहे हैं। सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों का कहना है कि प्रशासन को तत्काल ऐसे इलाकों में रैन बसेरों की व्यवस्था करनी चाहिए, ताकि कोई भी व्यक्ति खुले में ठंड से जान न गंवाए।
शहर के जागरूक नागरिकों ने जिला प्रशासन और नगर निगम के उच्च अधिकारियों से अपील की है कि वे इस गंभीर स्थिति का संज्ञान लें। स्मार्ट सिटी का सपना तभी सार्थक होगा, जब विकास के साथ-साथ इंसानियत और संवेदनशीलता भी सड़कों पर दिखाई दे।
घनाकोहरे और ठंड की यह रातें केवल मौसम की मार नहीं हैं, बल्कि यह सिस्टम के सामने खड़ा एक बड़ा सवाल भी हैं-क्या शहर सच में सभी के लिए सुरक्षित और संवेदनशील है?


