गाजियाबाद। कभी-कभी समाज में बड़े बदलाव शोर से नहीं, शांत करुणा से जन्म लेते हैं। राजनगर एक्सटेंशन की एसीसी हाइट्स सोसायटी में शुरू हुई ‘स्वाभिमान थाली’ ऐसी ही एक पहल है-जो भूख मिटाने से आगे बढ़कर सम्मान, संवेदना और सहभागिता की संस्कृति को मजबूत कर रही है। जुलाई माह से प्रतिदिन शाम 7 बजे मात्र 10 रुपये में मिलने वाली यह थाली आज कई सोसायटियों तक फैल चुकी है और जरूरतमंदों के जीवन में आशा और आत्मसम्मान का संदेश बन गई है।
इस पहल की आत्मा मानवता है। यहां भोजन दान के रूप में नहीं, बल्कि स्वाभिमान के साथ खरीदा जाता है। क्षेत्र में कार्यरत गार्ड, मेड, डिलीवरी बॉय, ऑटो और ई-रिक्शा चालक-दिन भर की मेहनत के बाद, जब सम्मानपूर्वक थाली लेते हैं, तो उनके चेहरे पर संतोष और अपनापन साफ झलकता है। यह केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि यह भरोसा है कि समाज उनके साथ खड़ा है।
‘स्वाभिमान थाली’ की एक और विशिष्टता इसकी समावेशी सोच है। भोजन स्थानीय टिफिन/क्लाउड किचन चलाने वाली महिलाओं द्वारा तैयार किया जाता है। इससे गुणवत्ता सुनिश्चित होती है और साथ ही महिलाओं के रोजगार, आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान को भी नई उड़ान मिलती है। सेवा करने वालों और सेवा पाने वालों -दोनों के जीवन में यह पहल सम्मान का पुल बनकर खड़ी है।
समाज में अक्सर सहायता और दया के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है, लेकिन यहां सहानुभूति (Empathy) ने दिशा तय की है, बिना किसी भेदभाव के, बिना किसी दिखावे के। यही कारण है कि शुरुआत भले ही कुछ लोगों ने की हो, आज अनेक सोसायटियों के निवासी इस प्रयास से जुड़ चुके हैं। यह सहभागिता बताती है कि जब नागरिक आगे आते हैं, तो मानवता संस्थागत रूप ले लेती है।

इस प्रेरक प्रयास पर स्थानीय निवासी दीपांशु मित्तल कहते हैं,
“स्वाभिमान थाली सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि एक विचार है, कि मदद सम्मान के साथ हो। 10 रुपये की यह थाली समाज को जोड़ती है, दिलों की दूरी कम करती है और यह विश्वास जगाती है कि कोई अकेला नहीं है।”
राजनगर एक्सटेंशन की यह पहल हमें याद दिलाती है कि करुणा का सबसे सुंदर रूप वह है, जो दूसरे को छोटा नहीं, बराबरी का एहसास कराए। ‘स्वाभिमान थाली’ आज एक सेवा नहीं, बल्कि संवेदनशील नागरिकता का प्रतीक बन चुकी है-एक ऐसा मॉडल, जिसे अपनाकर हर मोहल्ला, हर शहर, और हर समाज भूख से आगे बढ़कर मानव गरिमा की रक्षा कर सकता है।
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