बोंगोटेरू की रजत जयंती दुर्गा पूजा : संस्कृति, समुदाय और अपनेपन के 25 वर्ष पूरे

गाज़ियाबाद/दिल्ली-एनसीआर।
दिल्ली-एनसीआर का प्रमुख बंगाली सांस्कृतिक संगठन बोंगोटेरू इस वर्ष अपनी दुर्गा पूजा के 25 वर्ष पूरे कर रहा है। यह केवल एक पूजा उत्सव नहीं बल्कि प्रवासी बंगालियों के लिए “घर से दूर घर” का अहसास कराने वाला आयोजन है। ढाक की थाप, पारंपरिक भोग और भव्य पंडाल सज्जा से सजे इस महोत्सव में भावनाओं, परंपराओं और समुदाय की एक अनूठी छाप झलकती है।
इस वर्ष का थीम “स्वॉपनर 25” संस्थापक स्वप्न और उनके उस सपने को समर्पित है जिसमें दिल्ली-एनसीआर के हज़ारों बंगालियों के लिए अपनी संस्कृति और परंपरा को जीवित रखने का संकल्प लिया गया था। पंडाल की सजावट, रंगों का संयोजन और परंपरागत प्रतीक न सिर्फ अतीत को जीवित करते हैं बल्कि नई पीढ़ी को भी संस्कृति से जोड़ने का प्रयास करते हैं।
विशेष आकर्षण : अनिंद्य बोस का थीम सॉन्ग और भाग्यश्री का लॉन्च
इस रजत जयंती उत्सव की सबसे बड़ी विशेषता रही संगीतकार अनिंद्य बोस का विशेष थीम सॉन्ग। यह गीत बंगालियों की जड़ों और उनके भावनात्मक जुड़ाव को दर्शाता है। इसे बॉलीवुड अभिनेत्री भाग्यश्री ने शनिवार, 27 सितंबर को शिप्रा सनसिटी स्थित सेंट्रल पाम में पूजा के उद्घाटन समारोह के दौरान लॉन्च किया। कार्यक्रम में सिनेमा, कला, खेल और समाजसेवा की प्रतिष्ठित हस्तियां मौजूद रहीं।


परंपरा और आधुनिकता का संगम
बोंगोटेरू की दुर्गा पूजा में इस वर्ष भी सांस्कृतिक कार्यक्रमों की भरमार रहेगी – डांडिया, नृत्य, थिएटर और दिल्ली, मुंबई व बंगाल के कलाकारों के प्रदर्शन इसकी विशेषता होंगे।
मुख्य आकर्षण रही नवदुर्गा की मूर्ति, जिसे पश्चिम बंगाल के कृष्णानगर के कारीगरों ने तैयार किया है। बोंगोटेरू लगातार पांच वर्षों से इस परंपरा को निभा रहा है और इसे दिल्ली-एनसीआर में अनूठा बनाए हुए है।
अध्यक्ष का संदेश और सामाजिक पहल
बोंगोटेरू के अध्यक्ष सुरजीत डे पुरकायस्थ ने कहा –
“25 वर्षों की यह यात्रा केवल संस्कृति के संरक्षण की नहीं बल्कि समुदाय को जोड़ने की भी कहानी है। हमारा उद्देश्य हमेशा से रहा है कि दिल्ली-एनसीआर के लोग बंगाली संस्कृति का आनंद लें और इसे आत्मसात करें।”
उन्होंने बताया कि इस वर्ष बोंगोटेरू अपनी सीएसआर पहल के तहत शिक्षा, स्वास्थ्य और सामुदायिक कल्याण में योगदान देगा।
बोंगोटेरू की यह रजत जयंती दुर्गा पूजा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि प्रवासी बंगालियों के लिए संस्कृति, पहचान और अपनेपन के बंधन को मजबूत करने वाला आयोजन है।

