आध्यात्मिक एवं आर्य महिला सम्मेलन हर्षोल्लास से संपन्न

- पंच महायज्ञ एवं वेद मार्ग पर चलने से ही मानव कल्याण संभव – डॉ. जयेंद्र आचार्य
- अष्टांग योग से ही परमात्मा का साक्षात्कार संभव – डॉ. सुधा राणा
गाजियाबाद।
शनिवार, 27 दिसंबर 2025 को जिला आर्य प्रतिनिधि सभा, आर्य केंद्रीय सभा एवं नगर आर्य समाज के संयुक्त तत्वावधान में गुरुकुल, पटेल मार्ग पर आयोजित आध्यात्मिक एवं आर्य महिला सम्मेलन का द्वितीय दिवस हर्षोल्लास और वैदिक गरिमा के साथ संपन्न हुआ। सम्मेलन की अध्यक्षता तेजपाल एवं पूनम चौधरी ने की।
कार्यक्रम की शुरुआत सुप्रसिद्ध भजनोपदेशक नरेश दत्त के भजनों से हुई। ऋषि महिमा और ईश्वर भक्ति से ओतप्रोत भजनों ने वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया, जिसे सुनकर श्रोता भावविभोर हो उठे। महायज्ञ डॉ. जयेंद्र आचार्य के ब्रह्मत्व में संपन्न हुआ। उन्होंने यज्ञ एवं वेद की महिमा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पंच महायज्ञ और वेद मार्ग का अनुसरण ही मानव कल्याण का मार्ग है। अपने उद्बोधन में उन्होंने महर्षि दयानंद के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि सत्यार्थ प्रकाश में मानव जीवन से जुड़े प्रत्येक विषय पर वैज्ञानिक और तर्कपूर्ण विवेचना है। डॉ. आचार्य ने कहा कि स्वामी दयानंद ने अज्ञान के विरुद्ध सतत संघर्ष छेड़ा और विद्या की वृद्धि का संदेश दिया—“असत्य का त्याग और सत्य का ग्रहण” ही उनका मूल मंत्र था।
मुख्य अतिथि डॉ. सुधा राणा (अध्यक्ष, वैदिक योग समिति) ने महिलाओं के उत्थान में स्वामी दयानंद के योगदान को स्मरणीय बताया। उन्होंने पतंजलि के अष्टांग योग पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि आत्मा और परमात्मा का मिलन ही योग है तथा सत्य का साक्षात्कार समाधि है। पंचतत्वों—अग्नि, वायु, आकाश, पृथ्वी और जल—के संतुलन से ही आत्मोन्नति संभव है।
डॉ. प्रतिभा सिंघल ने जीवन में श्रवण और आचरण की एकरूपता पर बल देते हुए कहा कि कथनी-करनी का अंतर मिटाकर ही आध्यात्मिक उन्नति संभव है। ममता चौहान ने ‘माता निर्माता भवति’ का आवाहन करते हुए स्वामी श्रद्धानंद की पत्नी शिवदेवी के आदर्श जीवन का उल्लेख किया और पारिवारिक समर्पण व सुसंस्कारों का संदेश दिया।
वैदिक विद्वान विष्णुमित्र वेदार्थी ने नारी को ब्रह्मस्वरूप बताते हुए ब्रह्मचर्य, आहार, योगाभ्यास और प्राणायाम के माध्यम से निरोगी जीवन का आह्वान किया। मुख्य वक्ता डॉ. अर्चना प्रिय आर्या ने कहा कि महिलाओं को आचार्या, शास्त्री और ब्रह्मा के रूप में प्रतिष्ठा देने का श्रेय स्वामी दयानंद को जाता है। उन्होंने मातृत्व की भूमिका को समाज निर्माण का आधार बताया।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में पूनम चौधरी ने कहा कि महर्षि दयानंद के सिद्धांत—संस्कार, संगति और व्यवहार—पर चलकर ही विश्व शांति की स्थापना संभव है। वैदिक विद्वान कृष्ण शास्त्री, तेजपाल आर्य और नरेंद्र पांचाल ने भी विचार रखे। मंच संचालन कविता राठी ने किया, जबकि सत्यवीर चौधरी ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
कार्यक्रम में शिल्पा गर्ग, वंदना चौधरी, सुमन चौहान, वंदना आर्या, प्रवीण आर्य सहित अनेक गणमान्य महिलाएं उपस्थित रहीं। संध्या, शांतिपाठ और ऋषिलंगर के साथ सम्मेलन का समापन हुआ।

