लाला लाजपत राय स्मारक मेडिकल कॉलेज, मेरठ में दुर्लभ संयुक्त जुड़वां शिशुओं का सफल प्रसव
- पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मेडिकल साइंस की बड़ी उपलब्धि, डॉक्टरों की तत्परता और टीमवर्क ने बचाई दो जिंदगियाँ
मेरठ : पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सबसे प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थानों में शुमार लाला लाजपत राय स्मारक मेडिकल कॉलेज, मेरठ ने एक और महत्वपूर्ण चिकित्सा उपलब्धि अपने नाम दर्ज की है। यहां दुर्लभ संयुक्त जुड़वां (Conjoined Twins) शिशुओं का सफलतापूर्वक प्रसव किया गया है, जिसने पूरे क्षेत्र में चिकित्सा व्यवस्था की प्रशंसा और विश्वास को और मजबूत किया है।
🔸 बागपत की महिला को हुई समयपूर्व प्रसव पीड़ा
बागपत निवासी 24 वर्षीय प्रथमगर्भा महिला को समयपूर्व प्रसव पीड़ा (Preterm Labour) के चलते मेरठ मेडिकल कॉलेज के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग में भर्ती कराया गया। विभाग की वरिष्ठ आचार्या डॉ. रचना चौधरी के निर्देशन में महिला का इलाज शुरू किया गया।
🔸 संयुक्त जुड़वां की पुष्टि, अल्ट्रासाउंड और एमआरआई से हुई सटीक पहचान
जैसे ही अल्ट्रासाउंड जांच की गई, डॉ. यास्मीन उस्मानी (विभागाध्यक्ष, रेडियोलॉजी) ने इस बात की पुष्टि की कि गर्भ में मौजूद भ्रूण संयुक्त जुड़वां हैं। इन दोनों भ्रूणों का वक्ष (Chest) और उदर (Abdomen) एक-दूसरे से जुड़ा हुआ था और उन्होंने हृदय (Heart) एवं यकृत (Liver) जैसे अंग साझा किए हुए थे।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए तत्काल एमआरआई जांच करवाई गई ताकि ऑपरेशन के लिए स्पष्ट रणनीति बनाई जा सके।
🔸 4 अगस्त को हुआ आपातकालीन ऑपरेशन, डॉ. रचना चौधरी के नेतृत्व में चिकित्सकीय सफलता
स्थिति अत्यंत संवेदनशील और जटिल थी। 4 अगस्त 2025 को आपातकालीन सिजेरियन सेक्शन किया गया। इस ऑपरेशन का नेतृत्व डॉ. रचना चौधरी ने किया, और उन्होंने अपनी कुशलता से 2 किलोग्राम वजन के दो समयपूर्व (Preterm) नवजातों का जन्म सुनिश्चित किया।
जन्म के बाद शिशुओं को त्वरित रूप से नवजात शिशु विभाग (Nursery) में स्थानांतरित किया गया, जहां उनकी देखभाल डॉ. अनुपमा वर्मा द्वारा की जा रही है।
🔸 क्या होते हैं संयुक्त जुड़वां? जानिए यह कितनी दुर्लभ अवस्था है
संयुक्त जुड़वां (Conjoined Twins) शिशु वे होते हैं जो गर्भावस्था के शुरुआती चरण में अधूरी भ्रूण विभाजन प्रक्रिया के कारण एक-दूसरे से शारीरिक रूप से जुड़े रह जाते हैं। यह एक अत्यंत दुर्लभ चिकित्सकीय परिस्थिति है, जो लगभग 50,000 से 1,00,000 जन्मों में से एक में पाई जाती है।
- अधिकांश मामलों में शिशु मृत जन्म (Stillbirth) होते हैं या जन्म के तुरंत बाद जीवन नहीं बच पाता।
- जो जीवित रहते हैं, वे आमतौर पर शरीर के छाती, पेट या श्रोणि से जुड़े होते हैं।
- ऐसे शिशु कभी-कभी आंतरिक अंग भी साझा करते हैं, जिससे इलाज और संभावित सर्जरी और भी जटिल हो जाती है।
इस मामले में शिशु थोराको-ओंफालोफेगस (Thoraco-Omphalophagus) श्रेणी में आते हैं, जहां वक्ष और उदर संयुक्त होते हैं। भविष्य में चिकित्सकीय मूल्यांकन के पश्चात शल्यक्रिया (Surgical Separation) की संभावनाओं पर विचार किया जा सकता है।
🔸 प्रशासन और चिकित्सा समुदाय ने दी सराहना
मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. आर.सी. गुप्ता ने इस अभूतपूर्व चिकित्सकीय सफलता के लिए स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग, रेडियोलॉजी विभाग और नवजात देखभाल टीम को बधाई दी और कहा कि,
“इस जटिल ऑपरेशन ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि मेरठ मेडिकल कॉलेज की टीम किसी भी आपात स्थिति में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने में सक्षम है। यह सफलता मेडिकल शिक्षा और जनसेवा का बेहतरीन उदाहरण है।”


